जीवन उपहार

सोच, समझ, संकोच के बाद:


*जीवन उपहार*

यह एक परी की कहानी है,
चिरलंबित, चिरप्रतिक्षित आत्मीय कहानी;
मैं कहना चाहता हूँ,
क्योंकि मैंने सुनी नहीं है परी की कहानी।
अबूझ रही यह दुनिया मेरे बचपन में,
अनजान रहा मैं परियों से,
पूछा करता था मैं, क्या सच की होती है परी?
क्या कभी मेरे बिल्कुल पास हो सकती है परी?

वह एक सपना था,
सपना ही था।
आभास, बस पानी के बुलबुले ही थे।
और मैं?
जीवनपथ पर रहकर भी रहा निरा दिशाहीन।
भटका हुआ, शायद भ्रमित भी।

कविता कहने की आदत नहीं, फिर भी अगर कहूँ,
अच्छा करो, अच्छा पाओगे
बीते जन्म का नाता भी ढूँढ लाओगे
जैसे मैंने तलाश निकाला, तराश लिया।

एक पल बस करवट-सी ली मैंने
और बदल गया मेरा सु-भाग्य भी
ख़ुद से ही मिल गया मैं,
जीवन के एक सुंदर-से मोड़ पर।

समय ही नहीं लगा,
पता ही नहीं चला,
मैं कब नहीं रहा, कब खो गया,
मेरा मैं नहीं रहा,
मैं एक हो गया।

खुली आँखों का सपना कहेंगे आप,
मैं भी इसे विचारों के झालर ही कहता हूँ,
जिनमें मैं न रहा
अहम भी न रहा
बुद्धि भी खो गई
स्मृति भी गई,
सब चले गए।
मुझे मेरा ईष्ट मिल गया।
मैं मिल गया।

और, अब घोर आश्चर्य!
वह कहीं खोया पड़ा लड़कपन,
वही ग़ुमशुदा ख़ुशी
वही धुला-धुला आसमान
और, वही साँझ का तारा
जो रहा हमेशा मेरा सहारा
दिखा मुझे, एक नए रूप में,
आह! मेरे छुटपन का साथी,
कितनी ही कहानियाँ सुनी थी उसने मेरी!
वो सारे मानों फिर सुनाने आ पहुँचा मुझे।

मनु याद गए मुझे
अपनी पूरी परंपरा के साथ
श्रद्धा, चिंता, बुद्धि...
सभी तो खड़ी थी मेरे सामने;
वह देवलोक, वे देवगण,
वही शापित इंद्रासन
और वह रही परी।

लेकिन मैं ठिठका,
रुक गया।

और, अब?
रोज़मर्रा की इस जकड़न को तोड़ने का मन करता है।
वही रूप, वही रंग, वही बचपन है तो
आज फिर उमंग से उड़ने का मन करता है।
ख़ुद में ख़ुद से खो जाने का मन करता है।
एक नया ईश गढ़ने का मन करता है।
और, ईश की उस परी को फिर देखने का मन करता है।
(2007/08)

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