शब्द



 शब्दों की ये ठेकेदारी है

आवाज़ पर पड़ी पहरेदारी है

ज़ुबान से लटकी है ज़ंजीरें

प्रिय, अब न बोल के लब आज़ाद हैं

(2018)

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