| अधवारा नदी के बत्तख, आहिल, दरभंगा (फ़ोटोः प्रभाष के दत्ता) |
एक और वर्ष बीत गया
कई बीते हैं ऐसे,
न मालूम कब थाह मिलेगी
कहाँ, कैसे मिलेगी?
समय का चक्र बड़ा अज़ीब है
पता ही नहीं चलने देता
कब चला जाता है?
और कहाँ भला?
समस्याएँ देकर,
कभी लेकर,
कभी छोड़कर,
लेकिन तय है इसका जाना;
ठहर नहीं सकता,
मुड़ नहीं सकता।
इसकी भी मजबूरी है,
शायद मजबूती भी।
और, इधर...
क्यों परेशान हैं हम
समय को लेकर, समय के लिए
समय कोई निरपेक्ष वस्तु, मूल्य तो नहीं
इसका तो अस्तित्व भी नहीं है।
यह मनुज की सुविधा है,
सुविधा हेतु सर्जित है
लेकिन मनुष्य ही तंग है इससे।
न मालूम क्यों?
मनुष्य न हो
तो समय का क्या मोल?
कौन पूछेगा इसे?
किसके लिए रहेगा यह?
और, क्यों भला?
किन्तु, उलटकर देखें यदि
तो मनुष्य पूर्ण है समय के बिना भी
समय के निरपेक्ष भी।
हमने थोप लिया है समय को स्वयं पर।
समय न तो कभी था
न अभी है,
और न ही यह बर्बाद होता है;
बर्बाद तो मनुष्य होता है,
मनुष्यता होती है।
समय स्वमेव कुछ नहीं है,
हमारी सुविधा का एक यंत्र है,
हमारे कर्मों को संजोने का एक मंत्र है।
स्वतंत्र कर लें अगर समय से स्वयं को,
मानसिकता विकसित होगी
मानवता खिलेगी
ख़ुशियाँ होंगी
लेकिन कोई उम्र न होगी
उम्र का बंधन भी नहीं।
वर्ष बीतने का ग़म भी नहीं।
वर्ष क्या है?
बदलते मौसमों की एक गठरी।
मौसम, जो आते हैं समय की परवाह किए बग़ैर
कहते हैं कि समय फिरता नहीं
मौसम तो घिर, घेरकर आता है, बार-बार।
मौसम आनंद देता है,
समय? परेशानी, तनाव।
फिर भी, समय तो है
झूठा ही सही,
सापेक्ष ही सही
यंत्र ही सही,
यह है,
और है ख़ालिस हमारे लिए ही।
मानव सभ्यता का आविष्कार है समय।
व्यक्तित्व को बाँधता है समय।
हमारी तरंगों को,
उमंगों को,
भावनाओं को संजोता है समय।
हमारे समय को सँवारता है समय।
हमेशा सम् रहता है समय।
मनुजों का ही तो होता है समय,
पशुओं का नहीं।
हम ही तो मालिक हैं इसके
हम ही तो हैं समय।
30.12.2001
Comments
Post a Comment