कभी किसी अनायास पल में
यूँ ही बैठे एक याद-सी आती है,
दूर, पेड़ों के झुरमुट के पार
खिसकती ईंटों के एक मकान से
कोई बेमतलब निकल आती है,
पहचान जताती है
ऐसी कि अपनी ही लगती है,
बिछड़ी हुई, संजोई हुई
तह में लपेटी हुई;
गीता और रामायण की तरह।
या, क़ाग़ज़ के पन्नों में दम तोड़ चुके
गुलाब की तरह।
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दिसंबर, 2019
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