तुम्हारी याद आना कोई बड़ी बात नहीं
परेशानी ये है कि तुम्हारी याद कम नहीं होती
भूल जाएँ, न सोचें
और दीवानगी तो बिल्कुल न हो,
यही सोच-सोचकर
हर वक़्त याद तुम्हें ही करता हूँ,
सोता हूँ, जगता हूँ,
घर-दफ़्तर-बाज़ार भी करता हूँ
याद तुम्हें भरपूर
और ख़ुद को बेज़ार ही तो करता हूँ।
जलन, ईर्ष्या और ग़ुस्सा
न ऐसे आता मुझको था पहले
उम्र सारी गुज़ारी है
सलीके का पहरेदार बनकर अड़े रहने में
अब तोड़ी है जाकर शर्म की दीवार
अड़ी रह गई थी जो सीने में
छोड़ूँगा मैं कतई नहीं दिल,
जो अब गड़ गया है तुम्हारे सीने में।
जासूस बना, चोरी की,
चुपके-चुपके तुम्हारा व्हाट्सऐप स्टेटस देखा
मिलाया उस-के लास्ट सीन से,
ख़ुद को दिखलाया नया सबूत
खाई क़सम कि तोड़ू रिश्ता,
बंद करूँ पूजा, तोड़ फेंकूँ यह बुत-ए-जिगर
फिर जैसे ही आया फ़ोन तुम्हारा,
भूला शिकवा, गिला को किया गुल
खाई नई क़सम जब तुमने कहा
कि ये सब थी अकेली मेरी भूल।
ख़ुशी-ख़शी फिर चली ज़िदगी,
शाम और सहर हुए गुलज़ार।
लेकिन भीतर कहीं मालूम था मुझको
कि चाँदनी के दिन हैं ये बस चार
जाना ही था वापस तुमको
उसी पुरानी रिवायत पर,
ठेला तुमने एक बार फिर
कोरे क़ाग़ज़-से जीवन के हाशिए पर।
उम्मीद नहीं बची है अब कोई,
फल भोगता हूँ अपनी करनी के,
ग़लती की
मन को बेक़ाबू छोड़ने की
अरमानों के साथ दौड़ने की।
(मेरा स्टेशन आ गया)
26.01.2020

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