चल हर पल


वर्तमान जीवन है, रोशनी है
भूत बुझता, कभी-कभी जलता एक दीया है
भविष्य अँधेरा है जिसे उजियारे की आस है;
यहाँ तू है, तेरा दीया है
और रोशनी की चकाचौंध का अँधियारा।

तो, अँधेरों से निकल,
उजालों में चल
फूलों में बहुत जी लिए
अब काँटों पर चल
मंज़िल तुम्हें ढूँढ़ रही है होकर बेकल
राहों के ग़म आवाज़ दे रहे हैं
तुम्हें पल पल; लेकिन तू
ग़मों की फ़िक़्र न कर
ख़ुशी की ओर निकल
सबने खोज ली अपनी मंज़िल
तू क्या निकलेगा कल?

अब जाग तू भी,
घर से बाहर निकल
परेशानी है? होंगी बहुत
बस तू इतना कर कि
सामने ही देख
आगे ही चल।

ना! मत मुड़ पीछे,
देख न मुड़कर इधर
जो रह गया वो था कल
सामने तेरे है जो पल
वह न आएगा कल।
कालचक्र उसे भी ले जाएगा
तू क्या हाथ मलता रह जाएगा?
कुछ कर! चल।

1998

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