आत्म-आत्मा संवाद


तुम क्या हो, कौन हो?
पहचान क्या है तुम्हारी?
कविता हो?
या एक कबीर हो?
ईश की सुझाई एक तदबीर हो क्या?
कभी यू भी लगता है मुझे
तुम मेरी ही एक तहरीर हो।
बताओ न, क्या हो तुम?

"बनाने वाला ही जाने
वही समझे, वही पहचाने"

डर है मुझे कि तुम पिछड़ जाओ न मुझसे
रह जाए तुम्हारा साथ रूठ जाओ न मुझसे
ऐसा न हो कि
कहीं भटक जाऊँ
कभी बहक जाऊँ
दूर कहीं तुमसे
निकल जाऊँ?

"लेकिन यह मुमकिन नहीं कि
मैं दूर चली जाऊँ तुमसे
भटक जाऊँ, अलग हो जाऊँ तुमसे
मेरा अस्तित्व नहीं तुम्हारे बिना
मैं कुछ भी नहीं तुम्हारे बिना
तुम मेरी हिम्मत हो, मेरी तस्वीर हो"

मैं जा भी कहाँ सकता हूँ,
तुम मेरी ज़ंजीर हो :)

2.12.1997



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