अफ़सोस तेरा नहीं है मुझे ज़िंदगी
शिकायत भी तुझसे नहीं है
तू मुझे मिल जाएगी इक दिन
इस राह नहीं तो उस राह
इस नस में नहीं तो उस नस में,
तेरे जाने के बाद भी
मेरी याद किसी दिल में पल जाएगी
अफ़सोस है मगर गहरा
कि कह न सका जो कहना था
जो कहना चाहिए था।
उम्मीद, मैं करता रहा
राह, मैं देखता रहा
कुछ कर लाने का पहले,
यह हो न सका
और वह भी न हो पाया।
मैं थका और हारा,
लौट आया,
एक बार फिर शायद उठ लड़ने को
यह चीख़ने को कि देखो!
कमज़ोर नहीं हूँ मैं।
लेकिन ऐ ज़िंदगी तूने कह तो दिया होता,
"रास्ते बदल गए हैं अब"
और यह कि मैं धुंध से लड़ने उठ खड़ा हुआ हूँ।
आज, जब उम्मीद के होश ठिकाने आए तो
तेरी ग़िरफ़्त महसूस करता हूँ मैं,
अपनी उखड़ी हुई साँसों में
सूजे हुए दिल की फिसलती हुई नब्ज़ों में,
बँधे गले से गिरते हुए लफ़्ज़ों में।
और, उम्मीद?
घर के किसी कोने में
बुझती हुई राख़ में लेटी है।
या फिर,
सुलगने को तैयार बैठी है शायद।
02.12.1999

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