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| अस्पताल में उम्मीद की उम्मीद |
डर लगता है ये सोचकर कि बुढ़ापा तो एक दिन हमारा भी आएगा,
आज मौत से कम और अस्पताल से ज़्यादा डर लगता है,
लेेेकिन ये आज कल चला जााएगा।
एक वक़्त ऐसा आएगा जब
अस्पताल डर नहीं, उम्मीद दिलाएगा,
मृत्युहंता अवतार दिखेगा
और कष्ट की खिड़कियों के बीच से
जीवन की लकीर थोड़ी और लंबी दिखेगी।
ज्ञान ने तरक़्क़ी बहुत की है
लेकिन बचपन का नौसिखियापन
और बुढ़ापे की खिझा देने वाली सावधानी
अब तक बेइलाज है।
जब कभी गिरते थे बचपन में
"उठ जाओ, उठ जाओ"
सब चिल्लाते थे। यही नियम है शायद,
भूत में हिम्मत बढ़ाओ,
आज को हौसला दिलाओ,
और भविष्य को बस ढाढस बांधकर दे दो।
आज को गिरने का वो पुराना डर नहीं
बस तेज़ निकलने की चाह है।
कब ध्यान रहता है,
आगे बुढापा ही राह है।
फिर, बचपन का गिरना ही याद आना है,
एक चेतावनी की तरह
और गिरने से डर लगता है,
क्योंकि हर क़दम गिराने पर आमादा दीखता है।
शरीर मस्त हो तब भी हौसला पस्त हुआ रहता है,
मन-मस्तिष्क कमर में रस्सी बाँध खींचता है
बचपन की ओर, लड़कपन की ठौर में।

बुढ़ापे से सब डरते पर बुढापा सब का आता है इस लिए अपने बड़ों कि इतनी सेबा करे कि हो सके उनकी आशिर्वाद से अपना बुढाप सवर जाए - प्रणाम मम्मी कैसे है
ReplyDeleteबिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया आपने। बेहतर हैं।
Deleteबुढ़ापे से डर लगता है ..
ReplyDeleteखूबसूरत अभिव्यक्ति
अभी पता चला कि आपने इसे पढ़ा था। :)
Deleteअहां त छा गएलिए सर... शानदार
ReplyDeleteधन्यवाद।
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