मौनतंत्र का जिन्न

बेंगलुरू के लाल बाग़ में काठ की चील (फ़ोटो: प्रभाष के दत्ता)


बहुत अच्छा है कि दिल पर ज़ोर,
दिमाग़ पर क़ाबू रखते हो,
लेकिन ख़ुदक़ुशी से पहले तो उन्हें अकेला छोड़ दो;

भागते हुए क़दमों पर ग़ौर करो,
झुलसते अलकतरे को छोड़ दो,
माना कि मगज शीतल रखते हो अपना तुम,
लेकिन, जेहन से होकर जो अभी-अभी गुज़रा है,
उस धधकते ख़्याल को तो ज़रा उबलता छोड़ दो;

कितना घसीटोगे ख़ुद को,
कितनी पीटोगे छाती अपनी,
ज़रा-सा घाव है इस अखरोटी रूह के सीने पर
हवा लगने दो,
ज़रा तो लहकता हुआ छोड़ दो;

चलो माना कि दुश्वारियाँ हैं तुम्हारे भी हाँ कहने में,
लेकिन, इससे पहले कि चुप रहना ही दस्तूर बन जाए,
दो कौड़ी का ये दस्तूर ही चलो आज तोड़ दो;

नहीं होता तुमसे अब ये हुक़्म बजाना,
कह दो ना।
कहकर तो देखो।
यूँ फँसाना छोड़ दो।

कल रात गुज़री थी तुम्हारी ही गली से वो बयार,
मेरी खिड़कियों को भी तोड़ गई,
बड़ी जल्दी में थी,
तेज़ी से गुज़र गई वो हवा,
मुड़कर देखो।
देख तो लो।
चलो, अब ये ज़िद तोड़ दो।

आज ही लौटा हूँ मुशायरे से
तीन क़त्ल करके,
लफ़्ज़, अहसास और रूह को दफ़्न करके,
अब तो लौट जाओ,
मेरा घर, मेरी गली तो छोड़ दो।

अब किसका है डर तुम्हें?
ख़ुदा भी तुम, ख़ुदी भी तुम
बेख़ुदी में हम
बेख़ुद हैं हम
किसी से अब कह न सकेंगे,
मुझपे अब तो ये रहटी-रहम छोड़ दो।

16.11.2016
नई दिल्ली

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