जीवन को मुड़ कर एक बार देखता हूँ मैं,
राहें कितनी ही थी
मंज़िल बहुत कम;
सीधी-सीधी राहों पर टेढ़ा-मेढ़ा चलता रहा मैं;
ठोकरें बहुत लगी,
सँभला एक बार भी लेकिन नहीं मैं,
राह, हर एक ने सुझाई,
पर, एक भी देख न पाया मैं
टहलता रहा धूल-धूसरित पथ पर,
पदचिह्नों को पहचाने बग़ैर;
पुकार शोर बनकर भी आई,
सुन एक भी न पाया मैं;
आज मुड़कर विचारता हूँ,
विचरता हूँ,
तो पाता हूँ भूलों और अकर्मण्यता के मैदान में
कर्मों की अर्थपूर्ण अर्थहीनता की एक लड़ी;
हर प्रश्न अपने ऊपर ही लगाए गए चिह्न लगते हैं,
एक बाण की तरह चोट करते हैं,
और मैं हर वार का प्रतिघात करता हूँ
अपनों को, अपने को मूर्छित करता हूँ।

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