जीवन उम्मीद है
और मौत यथार्थ।
उम्मीद ज़िन्दगी की तरह उमंगों से भरी है,
यथार्थ मृत्यु की तरह शांत, स्थिर और नृशंस।
जहाँ तक ज़िन्दगी की डोर खिंचती है,
उम्मीद की चादर बेइंतहां फैली-सी होती है,
और, जहाँ मृत्यु लकीर खींचती है
उसके पार निर्विकार, निर्जन निर्वाण का विस्तार है।
साँस की रेहट पर जो उछलती-कूदती है ज़िन्दगी
वही देह की एक मेढ़ से टकराकर लौट नहीं पाती;
पूरी ज़िन्दगी जिस ज़िन्दगी ने ज़िन्दगी का रास्ता सुझाया,
वही ज़िन्दगी मौत के पहले दरवाज़े से वापस झाँककर, पलटकर अलविदा भी नहीं कहती।
अपनी आख़िरी मंज़िल पर पहुँचकर,
बड़ी बेरुख़ मतलबी और बदचलन हो जाती है ये ज़िन्दगी।
मृत्यु ज़िन्दगी की आख़िरी मोहब्बत है।

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