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| ©Hindnagar |
फ़िक़्र के पाँव नहीं होते
पंख भी नहीं होते
गाड़ियों में सवार होकर नहीं आती
बस यूँ ही अपना डेरा जमा लेती है।
न तो ये वक़्त की पाबन्द है
और न स्थिति-परिस्थिति की ग़ुलाम,
मन की ज़मीन में गड़ी किस बीज से अंकुरित हो जाये
इसका भी पता नहीं,
फ़िक़्र बस आ जाती है,
घेर लेती है अनायास मन को।
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