छुट्टी के दिन कम्बख़्त आज सुबह ही नींद खुल गयी
गली में पेड़ से गिरी पत्तियाँ फुसफुसा रही थी
कोई उन्हें भी उनींदी जगा, निकाल रहा था
जैसे कुत्ते के छोटे-छोटे पिल्ले एक-दूसरे पर चढ़ शोर मचाते हैं
पत्तियाँ भी हंगामा करने लगी थी।
कान पर दो मोटे तकिये डाल मैं पलटकर सो गया।
कान बंद, नींद चालू।
नाक खुली थी पर,
एक अजीब-सी पुरानी पहचान की गंध आयी,
तेज थी, बेचैनी हुई,
फिर पुरानी घिसी हुई पहियों से निकलने वाली आवाज़ भी आने लगी,
मजदूरों के ख़ुश होने जैसा मौसम लगने लगा।
ख़ुशी वैसे भी सोने नहीं देती।
सोने का मन बेहद था,
लेकिन नींद तो मानों बरसों की पूरी हो चली थी।
माथा ठनका अचानक,
ये गंध तो अलकतरे की है।
पाँच साल हो गए क्या?
देखो तो बाहर चुनाव आएँ हैं क्या?
तभी! सोचूँ कि आजकल क्यों
बसंत में भी मेंढकों की कूद लग रही है,
गिरगिटों ने नए सूट सिलवाएँ हैं,
पुदीने में आम का ख़्वाब सजा है,
बाज़ार में ईमानदारी की क्यारियाँ खिली हैं,
शूकरावतार वाले भी बुद्ध बने हैं
और, मुझे भी भाव मिलने लगा है।
वाकई, वक़्त चुनाव का आने लगा है।

Comments
Post a Comment